दिल्ली चुनाव 2025 सिर्फ़ एक चुनाव नहीं था, बल्कि यह लोकतंत्र का असली परीक्षण था। क्या यह निष्पक्ष था या विपक्ष की रणनीतिक घेराबंदी? पढ़ें पूरा विश्लेषण!
दिल्ली चुनाव 2025 को सिर्फ़ एक आम चुनाव समझना भूल होगी। यह सिर्फ़ एक चुनाव नहीं, लोकतंत्र का नंगा नाच था या एक रणनीतिक घेराबंदी? यह एक ऐसा राजनीतिक युद्ध था, जिसकी शुरुआत बीजेपी ने 2024 से जिस चालाकी से हरियाणा व महाराष्ट्र का विधान सभा चुनाव अलोकतांत्रिक तरीकों से जीत कर की थी। ठीक उसी तरह से लोकतन्त्र को अपने इशारों पर नचाते हुए दिल्ली में AAP को पूरी तरह से घेरने की रणनीति बनाई। यह घेराबंदी किसी प्राचीन युद्ध की तरह थी, जहाँ किले को जीतने के लिए चारों तरफ़ से हमला बोला जाता था। लेकिन उस समय भी कुछ न कुछ नैतिक मूल्यों को कुछ हद तक तो अपनाया ही जाता था, जबकि आज दुनियां के सबसे बड़े लोकतंत्र में भारत की सबसे बड़ी पार्टी कही जाने वाली BJP ने सभी नैतिक व मानवीय मूल्यों को ठेंगा दिखा कर यह चुनाव लड़ा था और विपक्षी पार्टियों द्वारा जीत की बाजी को उनसे छीन कर अपने नाम दर्ज़ करा लिया था।
उन तमाम अनैतिक हथखंडो की चर्चा जो BJP ने 2024 के हरियाणा, महाराष्ट्र और फिर 2025 होते होते, दिल्ली विधान सभा चुनाव में दुनियां में सर्वश्रेष्ठ भारतीय लोकतंत्र का नंगा नाच करवाया, विस्तार पूर्वक हम अपने इस लेख में करेगें। हम पूरी तरह से फोकस 2025 के दिल्ली विधान सभा चुनावों पर रखते हुए आगे बढ़ेंगे। और जानेंगे कि AAP से टकराने के लिए बीजेपी ने कैसे अपनी अनैतिक रणनीति 2022 से पंजाब चुनाव के बाद शुरू करते हुए 2025 तक अपने मंसूबों की चरम हदों तक पहुंचाई। आइए, विस्तार से समझते हैं कि कैसे बीजेपी ने दिल्ली में AAP को बेदखल करने की षड्यंत्रकारी योजना बनाई। कुछ विशेषज्ञों की राय तो यह भी बनी की AAP चुनाव हारी नहीं थी बल्कि देश की सर्वोच्च संस्था ने AAP को 2025 का दिल्ली विधानसभा चुनाव हरवाया था। पूरी खबर के लिए यहां पर क्लिक करें।
1. प्रस्तावना
दिल्ली चुनाव 2025 केवल सत्ता परिवर्तन या सरकार बनाने का खेल नहीं था, बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र की कार्यशैली पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न था। यह चुनाव ‘लोकतंत्र का नंगा नाच’ था या एक सोची-समझी रणनीतिक घेराबंदी – यह सवाल हर जागरूक नागरिक के मन में उठना स्वाभाविक है। क्योंकि परिस्थितियां एक तरह से अघोषित हिटलर शाही की भांति हो चली थीं जिधर देखो, जो भी सोचो मतलब लोकतंत्र में धुंधलाहट सी नज़र आने लगी थी। वजह तंत्र को BJP ने अपने अंदाज में चलने की ओर इशारा कर दिया था।
दिल्ली विधानसभा चुनाव 2025 में बीजेपी ने उक्त हथियारों का प्रदर्शन करते हुए 48 सीटें जीतीं, जबकि AAP को 22 सीटों पर संतोष करना पड़ा। यह पहली बार था जब बीजेपी ने 26 साल बाद दिल्ली में स्पष्ट बहुमत हासिल किया। इससे पहले 2015 के चुनाव में BJP को मात्र 03 सीटें मिलीं और AAP ने 70 में से 67 सीटें जीत कर इतिहास रच दिया था। इसी जीत को दौहराते हुए 2020 के चुनाव में AAP ने 62 सीटें जीतकर प्रचंड बहुमत हासिल किया था, और बीजेपी केवल 8 सीटों पर सिमट गई थी। इस बदलाव को समझने के लिए हमें दिल की गहराइयों में जाकर सोचना होगा कि दिल्ली की जनता जो AAP की काम की राजनीति से परे कुछ सोचने को तैयार ही नहीं थी । लेकिन…..? यह चुनावी प्रक्रिया कई अनदेखे राजनीतिक दांव-पेचों, अघोषित हिटलर शाही ,मीडिया नैरेटिव और सरकारी संस्थाओं की संदिग्ध भूमिका से भरी रही। यह ब्लॉग पड़ताल करेगा कि यह चुनाव वास्तव में कितना निष्पक्ष था, और क्या यह लोकतंत्र की जीत थी या एक पक्षीय घेराबंदी का उदाहरण?
2. चुनावी परिदृश्य: 2025 में दिल्ली की राजनीति
2.1 आप बनाम बीजेपी: आर-पार की लड़ाई
दिल्ली का 2025 विधानसभा चुनाव भारतीय राजनीति के सबसे चर्चित और विवादास्पद चुनावों में से एक बन गया। आम आदमी पार्टी (AAP) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के बीच यह सिर्फ़ एक चुनावी टकराव नहीं था, बल्कि अस्तित्व की लड़ाई थी। AAP, जो पिछले एक दशक से दिल्ली की सत्ता में थी, अपने विकास कार्यों, शिक्षा और स्वास्थ्य मॉडल को आधार बनाकर चुनाव में उतरी। दूसरी ओर, बीजेपी ने केंद्र सरकार की ताकतया फिर कहें कि मोदी जी अघोषित हिटलर शाही, मीडिया के प्रभाव और सरकारी एजेंसियों के उपयोग से एक आक्रामक अभियान चलाया। AAP के शीर्ष नेताओं को भ्रष्टाचार के नाम पर जेल भेजने से लेकर पार्टी के फंड पर सवाल उठाने तक, बीजेपी ने हर संभव कोशिश की कि AAP चुनाव से पहले ही लड़खड़ा जाए। चुनाव प्रचार के दौरान, बीजेपी ने केजरीवाल सरकार को “फ्री की रेवड़ी” संस्कृति का प्रतीक बताया, जबकि AAP ने इसे जनता के हक की सेवा करार दिया। इस लड़ाई ने दिल्ली की राजनीति को पूरी तरह से ध्रुवीकृत कर दिया, जहाँ आम जनता को दो ध्रुवों में बांट दिया गया – एक ओर बीजेपी समर्थक और दूसरी ओर केजरीवाल जी की काम की राजनीति के कट्टर समर्थक।
2.2 कांग्रेस की प्रासंगिकता: सिर्फ़ एक दर्शक?
दिल्ली चुनाव 2025 में कांग्रेस की भूमिका हमेशा की तरह कमजोर ही रही। 2013 तक दिल्ली में सत्ता संभालने वाली कांग्रेस पार्टी पिछले तीन विधानसभा चुनावों से पूरी तरह से अप्रासंगिक हो चुकी थी। 2020 के चुनाव में कांग्रेस को एक भी सीट नहीं मिली थी, और 2025 में भी वह हाशिए पर ही रही। पार्टी का संगठन बिखरा हुआ था, नेतृत्व में स्पष्टता नहीं थी, और कार्यकर्ता ज़मीनी स्तर पर सक्रिय नहीं थे। कांग्रेस के लिए यह चुनाव अस्तित्व बचाने का अवसर था या फिर बैक डोर से BJP की मदद, लेकिन वह अपने अस्तित्व को तो न बचा पाई पर BJP को मदद पहुंचाने में कामयाब रही। और कुछ विश्लेषकों का तो मानना ही था कि कांग्रेस का मुख्य उद्देश्य सिर्फ़ बीजेपी-विरोधी वोटों को बांटकर AAP को कमजोर करना था। वहीं, कुछ का मानना था कि कांग्रेस का निष्क्रिय रवैया यह साबित करता है कि वह दिल्ली की राजनीति में अब कोई महत्वपूर्ण भूमिका नहीं निभा सकती। कुल मिलाकर, कांग्रेस इस चुनाव में भी सिर्फ़ एक मूकदर्शक बनी रही, जिसका न तो कोई बड़ा प्रभाव पड़ा और न ही उसकी कोई मजबूत चुनावी रणनीति नज़र आई। हां इसकी मुकदर्शिका से BJP को ज़रूर फायदा हुआ।
2.3 नई रणनीतियाँ: मतदाताओं को लुभाने के लिए नए चुनावी पैंतरे
2025 के दिल्ली चुनाव में मतदाताओं को रिझाने के लिए कई नए चुनावी पैंतरे अपनाए गए। बीजेपी ने पूरी तरह से नकारात्मक अभियान पर जोर दिया, जहाँ उसने AAP सरकार के मन गडंत भ्रष्टाचार के कथित आरोपों को प्रमुख मुद्दा बनाया। सरकारी एजेंसियों की मदद से AAP के कई बड़े नेताओं पर छापे डाले गए, अधिकांश नेताओं को गिरफ्तार कर जेल में बहुत ही संगीन धाराओं (PMLA Act) ठूंस दिया गया और कई को चुनाव लड़ने से पहले ही कानूनी मामलों में उलझा दिया गया। दूसरी ओर, AAP ने अपना चुनावी नैरेटिव ‘दिल्ली के काम’ पर रखा, जहाँ उसने शिक्षा, स्वास्थ्य, मुफ्त बिजली-पानी जैसी योजनाओं को गिनाया और जनता से भावनात्मक अपील की कि अगर बीजेपी सत्ता में आई तो ये सब सुविधाएँ छीन ली जाएंगी। और वास्तविकता भी यही थी। क्योंकि BJP एक ऐसी पार्टी है जिसकी करनी और कथनी में बहुत अंतर होता है।
चुनाव प्रचार में सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म का भी जमकर उपयोग हुआ। बीजेपी ने प्रोपेगैंडा फैलाने के लिए बड़ी संख्या में बॉट्स और आईटी सेल का सहारा लिया, जबकि AAP ने अपने वालंटियर नेटवर्क को बढ़ाकर जमीनी स्तर पर मजबूत पकड़ बनाई। वहीं, कांग्रेस का प्रचार बेहद सुस्त रहा, और वह सिर्फ़ बयानबाजी तक ही सीमित रही। चुनाव से कुछ हफ्ते पहले बीजेपी ने दिल्ली के मतदाताओं को धार्मिक ध्रुवीकरण की ओर मोड़ने की भी कोशिश की, जहाँ उसने हिंदू-मुस्लिम विभाजन पैदा कर चुनावी लाभ लेने का प्रयास किया। कुल मिलाकर, 2025 का दिल्ली चुनाव केवल वोटिंग प्रक्रिया तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह एक ऐसी राजनीतिक लड़ाई बन गया जहाँ हर पार्टी ने अपने-अपने तरीके से जनता को प्रभावित करने की कोशिश की, चाहे वह नैतिक हो या अनैतिक। लेकिन जब तंत्र पक्षपाती हो जाता है तो नैतिकता टिक नहीं पाती।
3. यह चुनाव ‘लोकतंत्र का नंगा नाच’ कैसे बना?
3.1 ईडी, सीबीआई और पुलिस की भूमिका: क्या सरकारी एजेंसियों का दुरुपयोग हुआ?
दिल्ली चुनाव 2025 में सबसे ज्यादा चर्चा सरकारी एजेंसियों के दुरुपयोग की रही। चुनाव से पहले ही प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने आम आदमी पार्टी (AAP) के कई नेताओं के खिलाफ मामलों को तेज़ कर दिया। बीजेपी द्वारा मन गडंत शराब नीति घोटाले से लेकर धन शोधन (मनी लॉन्ड्रिंग) के आरोपों तक, इन एजेंसियों ने AAP को घेरने के लिए पूरी ताकत झोंक दी। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल जी के सबसे करीबी सहयोगियों को गिरफ्तार किया गया, साथ ही खुद केजरीवाल जी को भी बार-बार पूछताछ के लिए बुलाया गया।
चुनाव से ठीक पहले, दिल्ली पुलिस और दूसरी सरकारी संस्थाओं ने AAP कार्यकर्ताओं पर सख्ती बढ़ा दी। कई रैलियों और सभाओं को अनुमति नहीं दी गई, प्रचार सामग्री ज़ब्त कर ली गई और पार्टी के वित्तीय संसाधनों को बाधित करने की कोशिश की गई। इन कार्रवाइयों से यह साफ़ दिखा कि सरकारी एजेंसियाँ स्वतंत्र रूप से काम नहीं कर रही थीं, बल्कि उन्हें सत्तारूढ़ दल की राजनीतिक रणनीति का हिस्सा बना दिया गया था। लोकतंत्र में चुनाव निष्पक्ष होने चाहिए, लेकिन 2025 के चुनाव में केंद्र सरकार की एजेंसियों का जो हस्तक्षेप दिखा, उसने पूरी प्रक्रिया को संदेहास्पद बना दिया।
3.2 आप नेताओं की गिरफ्तारी और धमकियाँ: लोकतांत्रिक प्रक्रिया या विपक्ष को कुचलने की रणनीति?
2025 का दिल्ली चुनाव एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया से ज़्यादा एकतरफा लड़ाई जैसा दिखा, जिसमें विपक्ष को हराने के लिए हर संभव तरीका अपनाया गया। AAP के कई बड़े नेता चुनावी प्रक्रिया के दौरान जेल में डाल दिए गए। दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया जी समेत कई वरिष्ठ मंत्रियों को भ्रष्टाचार के नाम पर गिरफ्तार किया गया, जिससे पार्टी की चुनावी रणनीति कमजोर पड़ गई।
AAP के कार्यकर्ताओं और नेताओं पर लगातार धमकियाँ दी गईं। सोशल मीडिया पर कई कार्यकर्ताओं को झूठे मामलों में फंसाने की धमकी दी गई, और कुछ मामलों में तो उन्हें शारीरिक हमलों तक का सामना करना पड़ा। इस तरह की खुली अघोषित हिटलर शाही के डर से बहुत सारे कार्यकर्ताओं ने खुलकर AAP का साथ देने में दूरी बना ली। बीजेपी के आईटी सेल ने AAP के खिलाफ एक जबरदस्त दुष्प्रचार अभियान चलाया, जिसमें फर्जी वीडियो और गलत सूचनाओं के ज़रिए पार्टी और अरविंद केजरीवाल जी की छवि खराब करने की कोशिश की गई। इस पूरे घटनाक्रम ने एक गंभीर सवाल खड़ा कर दिया – क्या चुनावी मैदान में लड़ाई विचारों और नीतियों के आधार पर लड़ी जा रही थी, या विपक्ष को पूरी तरह से मिटाने की कोशिश की जा रही थी?
3.3 चुनावी प्रक्रिया पर संदेह: क्या चुनाव निष्पक्ष और पारदर्शी रहे?
दिल्ली चुनाव 2025 की निष्पक्षता पर कई सवाल खड़े हुए। चुनाव आयोग पर निष्पक्षता बनाए रखने के बजाय सत्ता पक्ष के हितों के अनुरूप काम करने के आरोप लगे। मतदाता सूची में गड़बड़ियों की शिकायतें आईं, कई मतदाताओं के नाम अचानक हटा दिए गए, और कई बूथों पर मतदान प्रक्रिया में गड़बड़ियों की खबरें सामने आईं।
चुनाव प्रचार के दौरान बीजेपी को सरकारी मशीनरी का पूरा समर्थन मिला। सरकारी मीडिया संस्थानों ने बीजेपी के प्रचार को प्रमुखता दी, जबकि AAP की खबरों को या तो दबा दिया गया या उन्हें नकारात्मक रूप में दिखाया गया। ईवीएम (इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन) को लेकर भी संदेह बना रहा, क्योंकि कई विपक्षी दलों ने आरोप लगाए कि वोटिंग पैटर्न अप्रत्याशित रूप से बीजेपी के पक्ष में झुका हुआ था।
कुल मिलाकर, दिल्ली चुनाव 2025 सिर्फ़ एक चुनाव नहीं, बल्कि सत्ता पक्ष द्वारा लोकतंत्र को अपने नियंत्रण में लेने की एक रणनीतिक कोशिश बन गया। सरकारी एजेंसियों का दुरुपयोग, विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारियाँ, मीडिया का दमन और चुनावी प्रक्रिया पर सवाल – इन सबने मिलकर इसे एक निष्पक्ष चुनाव से ज़्यादा ‘लोकतंत्र का नंगा नाच’ बना दिया।
4. क्या यह सिर्फ़ एक रणनीतिक घेराबंदी थी?
4.1 BJP की गवर्नेंस बनाम AAP का ‘दिल्ली मॉडल’
दिल्ली चुनाव 2025 में असली टकराव दो अलग-अलग गवर्नेंस मॉडल्स के बीच था – बीजेपी का केंद्रीकृत शासन मॉडल बनाम AAP का ‘दिल्ली मॉडल’। बीजेपी का दावा था कि उसकी “डबल इंजन सरकार” (केंद्र और राज्य में एक ही पार्टी की सरकार) दिल्ली के विकास को गति दे सकती है, जबकि AAP ने अपने ‘दिल्ली मॉडल’ के तहत शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली, पानी और ट्रांसपोर्ट में किए गए कार्यों को जनता के सामने रखा।
AAP ने अपनी चुनावी रणनीति में यह दिखाने की कोशिश की कि बीजेपी सिर्फ़ बड़े उद्योगपतियों की सरकार है, जो आम लोगों की बुनियादी जरूरतों को नज़रअंदाज करती है। वहीं, बीजेपी ने AAP को भ्रष्टाचार और झूठे वादों की सरकार बताया। दिलचस्प बात यह थी कि बीजेपी के पास दिल्ली के विकास को लेकर कोई ठोस एजेंडा नहीं था। उसने चुनावी अभियान को AAP सरकार की नाकामियों को गिनाने, अरविंद केजरीवाल जी को गाली देने तक सीमित रखा, लेकिन खुद क्या करेगी, इसका कोई स्पष्ट खाका पेश नहीं किया। इस चुनाव में मतदाता दो विचारधाराओं के बीच बंटा गया– एक तरफ़ बीजेपी की ‘राष्ट्रवाद और हिंदुत्व’ आधारित राजनीति, और दूसरी ओर AAP की ‘विकास और कल्याणकारी नीतियों’ पर टिकी काम की राजनीति।
4.2 ‘फ्री की रेवड़ी’ बनाम ‘डबल इंजन सरकार’ नैरेटिव
बीजेपी ने 2025 के दिल्ली चुनाव में अपने प्रचार अभियान का बड़ा हिस्सा ‘फ्री की रेवड़ी’ के खिलाफ़ बनाया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अन्य बीजेपी नेताओं ने बार-बार कहा कि AAP जनता को मुफ्त सुविधाओं का लालच देकर अपनी सत्ता बचाने की कोशिश कर रही है। इसके विपरीत, AAP ने इसे जनता के हक की सेवा बताते हुए कहा कि उनकी योजनाएँ आम लोगों के जीवन स्तर को बेहतर बनाने के लिए हैं।
बीजेपी ने यह नैरेटिव सेट करने की कोशिश की कि ‘डबल इंजन सरकार’ (दिल्ली में भी बीजेपी की सरकार) बनने से केंद्र की योजनाओं को तेज़ी से लागू किया जा सकेगा। लेकिन इसका असर दिल्ली के शहरी मतदाताओं पर खास नहीं पड़ा, क्योंकि उन्हें पहले से ही पता था कि केंद्र की योजनाएँ राज्य सरकारों की परवाह किए बिना भी लागू की जा सकती हैं। और चुनाव आते आते BJP ने AAP की कल्याणकारी योजनाएं जिनको अबतक फ्री की रेवड़ी बताती रही, उसी को खुद ने भी अपनाना शुरू कर दिया। खैर इस बात पर दिल्ली की जनता ने BJP से ज्यादा AAP पर भरोसा किया। वहीं, AAP ने बीजेपी की ‘डबल इंजन सरकार’ की अवधारणा को पलटते हुए यह प्रचार किया कि इससे सिर्फ़ भ्रष्टाचार और केंद्रीय दखल बढ़ेगा, और दिल्ली की जनता का हक मारा जाएगा।
4.3 आप के नेताओं पर कानूनी शिकंजा: संयोग या प्रयोग?
2025 के चुनाव में एक और बड़ा सवाल उठा – क्या AAP के नेताओं के खिलाफ़ कानूनी कार्रवाई महज संयोग था, या यह एक सोची-समझी रणनीति थी? चुनाव से कुछ महीनों पहले तक अरविंद केजरीवाल समेत कई बड़े AAP नेता ईडी और सीबीआई की रडार पर आ गए। कुछ को गिरफ्तार कर लिया गया, कुछ को बार-बार पूछताछ के लिए बुलाया गया, और कुछ विश्लेषको का तो यह भी मानना है कि AAP पार्टी के फंड्स तक को जाँच के नाम पर रोक दिया गया।
इस तरह की कार्रवाइयों का पैटर्न देखकर यह कहना मुश्किल नहीं था कि यह सब AAP को चुनाव से पहले कमजोर करने की एक सोची-समझी योजना का हिस्सा था। बीजेपी ने AAP को भ्रष्ट साबित करने के लिए अपने मीडिया नैरेटिव का भी जमकर इस्तेमाल किया। टीवी चैनलों और सोशल मीडिया पर लगातार AAP के खिलाफ़ प्रोपेगेंडा फैलाया गया, जिससे जनता के बीच भ्रम की स्थिति बनाई जा सके।
चुनाव के दौरान सरकारी एजेंसियों की इस सक्रियता ने लोकतंत्र पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। क्या यह सिर्फ़ एक निष्पक्ष जांच थी, या फिर एक राजनीतिक षड्यंत्र? यह सवाल आज भी बना हुआ है, लेकिन एक बात साफ़ है – दिल्ली चुनाव 2025 में कानून और जांच एजेंसियों का इस्तेमाल पूरी तरह से राजनीतिक हथियार के रूप में किया गया।
5. आम आदमी पार्टी बनाम विपक्ष: असली मुद्दे और एजेंडा
5.1 AAP का वादा: फ्री बिजली-पानी और शिक्षा सुधार
आम आदमी पार्टी (AAP) ने दिल्ली चुनाव 2025 में भी अपने “दिल्ली मॉडल” को ही अपनी सबसे बड़ी ताकत बनाया। AAP ने जनता से वादा किया कि उनकी सरकार जारी रही, तो फ्री बिजली-पानी, मोहल्ला क्लीनिक और सरकारी स्कूलों में सुधार जैसी योजनाएँ और भी मज़बूत होंगी। शिक्षा और स्वास्थ्य सुधार AAP की पहचान बन चुके थे, और अरविंद केजरीवाल जी की AAP ने इन्हीं मुद्दों को केंद्र में रखकर चुनाव लड़ा। क्योंकि दुनियां में एक ही बात चर्चा में रहती थीं की दिल्ली की जनता के लिए AAP की काम की राजनीति प्राण वायु बन चुकी है।
केजरीवाल जी ने बार-बार यह संदेश दिया कि दिल्ली सरकार का बजट जनता के कल्याण पर खर्च किया जाएगा, न कि अमीर उद्योगपतियों को फायदा पहुंचाने में। उन्होंने तर्क दिया कि फ्री बिजली-पानी और सरकारी स्कूलों में सुधार कोई ‘फ्री की रेवड़ी’ नहीं, बल्कि जनता के टैक्स का सही उपयोग है। इसके अलावा, AAP ने महिला सुरक्षा, परिवहन सुधार और पर्यावरण संरक्षण को भी अपने घोषणापत्र में प्रमुखता दी।
लेकिन 2025 के चुनाव में AAP को अपनी योजनाओं को जनता तक पहुँचाने में भारी दिक्कतें आईं, क्योंकि मीडिया का बड़ा हिस्सा बीजेपी के नैरेटिव को आगे बढ़ा रहा था। इसके बावजूद, दिल्ली के गरीब और मध्यम वर्गीय मतदाताओं के बीच AAP की योजनाओं का असर कायम रहा।
5.2 BJP का फोकस: ‘राष्ट्रीयता’ और ‘मोदी लहर’
बीजेपी ने इस चुनाव में एक बार फिर अपने परंपरागत नैरेटिव – ‘राष्ट्रवाद’ और ‘मोदी लहर’ – को भुनाने की कोशिश की। पार्टी ने प्रचार अभियान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को केंद्र में रखा और दावा किया कि दिल्ली को ‘डबल इंजन सरकार’ की ज़रूरत है, ताकि केंद्र और राज्य के तालमेल से तेज़ विकास हो सके।
बीजेपी ने AAP सरकार पर राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों को समर्थन देने के आरोप लगाए। प्रचार अभियान में बार-बार यह कहा गया कि AAP सरकार “अराजकता” फैलाती है और दिल्ली को स्थिरता की ज़रूरत है। साथ ही, बीजेपी ने चुनाव के दौरान बड़े हिंदू-राष्ट्रवादी मुद्दों को भी उछाला, जैसे राम मंदिर, कश्मीरी पंडितों की वापसी और समान नागरिक संहिता (UCC)।
दिल्ली में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की भी कोशिश की गई, लेकिन शहरी और पढ़े-लिखे मतदाताओं पर इसका उतना प्रभाव नहीं पड़ा। और साथ ही एक हथियार और जो अघोषित तौर पर काम कर रहा था वह था BJP की षड्यंत्रकारी रणनीति जिसने अपना पूरा काम किया और BJP को जीत दिलाई, हालांकि, बीजेपी ने झुग्गी-झोपड़ी इलाकों और बाहरी दिल्ली के ग्रामीण क्षेत्रों में इस नैरेटिव को जमकर फैलाया। लेकिन चुनाव में बीजेपी के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि वह दिल्ली के विकास से जुड़ा कोई ठोस एजेंडा पेश नहीं कर पाई, जबकि AAP के पास जनता के लिए स्पष्ट योजनाएँ थीं।
5.3 जनता की प्राथमिकताएँ: रोज़गार, महंगाई और भ्रष्टाचार
दिल्ली के मतदाताओं के लिए सबसे अहम मुद्दे रोज़गार, महंगाई और भ्रष्टाचार थे। युवाओं के बीच बेरोज़गारी एक गंभीर समस्या थी, लेकिन जब जब AAP ने इस पर ठोस समाधान देने की बात कही तब तब BJP ने बजाय साथ देने के आरोप प्रत्यारोप ही लगने जारी रखे। महंगाई भी एक बड़ा चुनावी मुद्दा था। पेट्रोल-डीजल की कीमतें, घरेलू गैस की बढ़ती दरें और ज़रूरी सामानों की महंगाई से जनता पहले से ही परेशान थी। AAP ने इसे केंद्र सरकार की नाकामी बताया, जबकि बीजेपी ने इसे वैश्विक कारणों से जोड़ा और दिल्ली सरकार की कर नीतियों को ज़िम्मेदार ठहराने की कोशिश की।भ्रष्टाचार का मुद्दा भी चुनाव में प्रमुख रहा। बीजेपी ने AAP को शराब नीति घोटाले और फंडिंग में गड़बड़ियों के आरोपों में घेरने की कोशिश की। वहीं, AAP ने पलटवार करते हुए कहा कि बीजेपी खुद भ्रष्टाचार में लिप्त है और जांच एजेंसियों का दुरुपयोग करके विपक्ष को कमजोर करने की राजनीति कर रही है।
6. बीजेपी की चुनावी रणनीति और सरकारी एजेंसियों की भूमिका
6.1 क्या दिल्ली के चुनावों में ईडी-सीबीआई की सक्रियता महज संयोग थी?
दिल्ली विधानसभा चुनाव 2025 के दौरान प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) जैसी एजेंसियों की असाधारण सक्रियता ने पूरे चुनावी माहौल को प्रभावित किया। आम आदमी पार्टी (AAP) के प्रमुख नेताओं पर जांच और छापेमारी तेज़ कर दी गई। चुनाव से ठीक पहले अरविंद केजरीवाल के करीबी नेताओं को तलब किया जाना, मनीष सिसोदिया और सत्येंद्र जैन की लंबी जेल यात्रा, और AAP के कई अन्य नेताओं पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों ने यह सवाल खड़ा किया कि क्या यह सिर्फ़ संयोग था या एक सुनियोजित रणनीति?
बीजेपी की रणनीति यह दिखाने की थी कि AAP भ्रष्टाचार में लिप्त है और इसके बड़े नेता जेल में हैं, इसलिए जनता को उस पर भरोसा नहीं करना चाहिए। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या इसी तरह की तत्परता बीजेपी के खिलाफ़ लगे आरोपों में भी दिखाई गई? क्या कर्नाटक, मध्य प्रदेश और अन्य राज्यों में बीजेपी नेताओं के खिलाफ़ कोई बड़ी कार्रवाई हुई? इसका उत्तर नकारात्मक था। इससे साफ़ था कि सरकारी एजेंसियों की सक्रियता केवल एकतरफा थी, जिससे चुनावों को प्रभावित करने का संदेह पैदा हुआ।
6.2 विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारी: चुनाव से ठीक पहले क्यों बढ़ी कार्रवाई?
दिल्ली चुनाव से कुछ महीनों पहले ही AAP के कई बड़े नेताओं पर कानूनी शिकंजा कसना शुरू हो गया था। पहले शराब नीति घोटाले के नाम पर मनीष सिसोदिया को जेल भेजा गया, फिर स्वास्थ्य घोटाले में सत्येंद्र जैन की मुश्किलें बढ़ाई गईं, और फिर चुनाव आते-आते केजरीवाल के करीबियों पर छापेमारी शुरू हो गई।
यह देखना दिलचस्प था कि विपक्षी नेताओं पर कार्रवाई का पैटर्न हर चुनाव में एक जैसा ही रहा। 2024 के लोकसभा चुनावों से पहले महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे गुट, पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और झारखंड में हेमंत सोरेन पर इसी तरह की कार्रवाई हुई थी। हरियाणा और महाराष्ट्र के विधानसभा चुनावों से पहले भी विपक्षी नेताओं पर ईडी और सीबीआई की जांचें तेज़ हुईं। यही प्रक्रिया दिल्ली चुनावों में भी दोहराई गई।
इससे यह सवाल उठना लाज़मी था कि क्या जांच एजेंसियाँ निष्पक्ष थीं, या वे सिर्फ़ बीजेपी के राजनीतिक विरोधियों को कमजोर करने के लिए सक्रिय की जा रही थीं? यदि वास्तव में भ्रष्टाचार मिटाना ही मकसद था, तो फिर बीजेपी के उन नेताओं पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई जिन पर घोटालों के आरोप लगे थे?
6.3 न्यू इंडिया का लोकतंत्र: निष्पक्षता या एकपक्षीय राजनीति?
नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी ने ‘न्यू इंडिया’ की जो परिकल्पना दी थी, उसमें चुनावी निष्पक्षता और लोकतांत्रिक मूल्यों की लगातार अनदेखी होती दिखी। दिल्ली चुनाव 2025 में सरकारी संस्थाओं का राजनीतिक उपयोग खुले तौर पर हुआ। मीडिया, न्यायपालिका और कानून-व्यवस्था के संस्थानों पर यह आरोप लगा कि वे सत्ता पक्ष के इशारों पर काम कर रहे थे।
जहाँ चुनाव आयोग को निष्पक्ष रहना चाहिए था, वहीं उसने AAP की शिकायतों पर उतनी गंभीरता नहीं दिखाई जितनी बीजेपी के पक्ष में काम करने वाले मामलों में दिखी। मैनस्ट्रीम मीडिया ने भी सरकार के खिलाफ़ उठने वाले सवालों को प्रमुखता नहीं दी, बल्कि बीजेपी के नैरेटिव को ही आगे बढ़ाया।
लोकतंत्र की मूल भावना में निष्पक्षता और स्वतंत्रता होती है, लेकिन दिल्ली के चुनावों में यह दोनों ही चीज़ें सवालों के घेरे में रहीं। एकतरफा कार्रवाई और सरकारी एजेंसियों का दुरुपयोग इस बात का संकेत था कि लोकतांत्रिक व्यवस्था को धीरे-धीरे एक नियंत्रित प्रणाली में बदला जा रहा था, जहाँ सत्ता के खिलाफ़ खड़े होने वालों को कानूनी, आर्थिक और सामाजिक रूप से तोड़ा जाता है।
7. मीडिया की भूमिका: निष्पक्षता या प्रोपेगेंडा?
7.1 गौदी मीडिया बनाम स्वतंत्र पत्रकारिता
दिल्ली चुनाव 2025 के दौरान मीडिया की भूमिका पर सवाल उठना लाज़मी था। मुख्यधारा के कई बड़े चैनल और अखबार सत्ता पक्ष के प्रचारक की तरह काम करते नज़र आए। पिछले कुछ वर्षों में भारतीय मीडिया का एक बड़ा वर्ग ‘गौदी मीडिया’ (गोदी मीडिया) के रूप में पहचाना जाने लगा है, जो सत्ता की भक्ति में लगा रहता है और विपक्ष के खिलाफ़ दुष्प्रचार करता है।
चुनाव से पहले AAP पर भ्रष्टाचार के आरोपों को जिस तरह प्रमुखता से दिखाया गया, वहीं बीजेपी शासित राज्यों में हुए घोटालों पर मीडिया ने चुप्पी साध ली। अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, सत्येंद्र जैन और अन्य AAP नेताओं की गिरफ्तारी को नैतिक रूप से सही ठहराने के लिए घंटों लंबी डिबेट कराई गईं, लेकिन क्या यही बहस बीजेपी के भ्रष्टाचार पर भी हुई? जवाब साफ़ था – नहीं।
दूसरी ओर, स्वतंत्र पत्रकारिता ने इस चुनाव में भी सच्चाई दिखाने की कोशिश की, लेकिन उन पर दवाब लगातार बना रहा। कई स्वतंत्र पत्रकारों के सोशल मीडिया अकाउंट्स को रिपोर्ट कर सस्पेंड कराया गया, उन पर केस दर्ज किए गए, और कुछ को धमकियाँ भी मिलीं। इससे साफ़ हो गया कि चुनावी नैरेटिव को एकतरफा ढंग से सेट करने की पूरी कोशिश की गई।
7.2 टीवी डिबेट्स और ग्राउंड रिपोर्ट्स में विरोधाभास
अगर दिल्ली चुनाव 2025 के दौरान टीवी डिबेट्स को देखा जाए, तो यह साफ़ नज़र आया कि कैसे पैनल में बैठे तथाकथित ‘विशेषज्ञ’ विपक्ष के खिलाफ़ माहौल बनाने में लगे रहे। टीवी डिबेट्स में AAP को सिर्फ़ बचाव की मुद्रा में रखा गया, जबकि बीजेपी के प्रवक्ताओं को खुलकर बोलने का मौका दिया गया। [Visit Here(TruthLensByDigitalUdaan)]
टीवी चैनलों ने चुनावी मुद्दों पर चर्चा करने के बजाय विपक्ष को बदनाम करने पर ज़्यादा ध्यान दिया। AAP के फ्री बिजली, पानी और शिक्षा मॉडल को ‘रेवड़ी कल्चर’ बताया गया, जबकि बीजेपी के चुनावी वादों को ‘विकास’ के रूप में पेश किया गया।
लेकिन जब कुछ स्वतंत्र पत्रकार ग्राउंड पर गए, तो उन्होंने जनता से अलग ही प्रतिक्रिया सुनी। दिल्ली की झुग्गी-झोपड़ी और मध्यमवर्गीय कॉलोनियों में लोगों ने कहा कि उन्हें AAP सरकार की योजनाओं से फायदा हुआ, जबकि महंगाई और बेरोजगारी के मुद्दे पर बीजेपी से नाराज़गी भी ज़ाहिर की।
यानी, टीवी डिबेट्स में जो नैरेटिव सेट किया जा रहा था, वह ज़मीनी हकीकत से मेल नहीं खा रहा था। यह दिखाता है कि किस तरह मीडिया का एक बड़ा वर्ग जनता की असली आवाज़ को दबाने और एक विशेष राजनीतिक दल के पक्ष में हवा बनाने का काम कर रहा था।
7.3 सोशल मीडिया पर AAP vs BJP नैरेटिव वॉर
2025 का दिल्ली चुनाव सोशल मीडिया युद्ध का मैदान भी बन गया था। ट्विटर (अब X), फेसबुक, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर दोनों दलों ने अपनी रणनीति जमकर चलाई। बीजेपी के आईटी सेल ने AAP के खिलाफ़ जबरदस्त दुष्प्रचार किया। सोशल मीडिया पर ट्रेंड्स चलाए गए कि AAP भ्रष्टाचार में डूबी हुई है, मुफ्त योजनाएँ देश को बर्बाद कर रही हैं, और दिल्ली में ‘शाहीन बाग़ पार्ट 2’ की साजिश चल रही है। कई फेक न्यूज़ वेबसाइट्स और व्हाट्सएप फॉरवर्ड्स के जरिए AAP सरकार को निशाना बनाया गया।
AAP ने भी सोशल मीडिया पर बीजेपी को जवाब देने की पूरी कोशिश की। AAP के डिजिटल वॉरियर्स ने मोदी सरकार के ‘डबल इंजन’ मॉडल की आलोचना की, केंद्र सरकार के भ्रष्टाचार और महंगाई के मुद्दे को उछाला, और बीजेपी की सांप्रदायिक राजनीति को उजागर किया। साथ ही बीजेपी की षड्यंत्रकारी रणनीति को भी। लेकिन उनके कई पोस्ट्स को रिपोर्ट कर डाउन किया गया, जिससे उनका डिजिटल कैंपेन कुछ हद तक प्रभावित हुआ।
स्वतंत्र पत्रकारों और डिजिटल क्रिएटर्स ने चुनाव के असली मुद्दों को सामने लाने की कोशिश की, लेकिन उन पर बीजेपी के आईटी सेल द्वारा ट्रोल आर्मी छोड़ दी गई। सोशल मीडिया अब एक ऐसा हथियार बन चुका है, जिसका इस्तेमाल सत्ताधारी दल अपनी छवि चमकाने और विरोधियों को दबाने के लिए कर रहा है। दिल्ली चुनाव 2025 इसका सबसे बड़ा उदाहरण बना, जहाँ डिजिटल युद्ध ज़मीन से ज़्यादा आक्रामक दिखा। दिल्ली चुनाव 2025 में मीडिया की भूमिका एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई। मुख्यधारा की मीडिया ने सत्ता पक्ष के नैरेटिव को आगे बढ़ाने का काम किया, जबकि स्वतंत्र पत्रकारों को दबाने की कोशिशें हुईं। टीवी डिबेट्स और ज़मीनी सच्चाई के बीच भारी अंतर दिखा, और सोशल मीडिया पर बीजेपी और AAP के बीच जबरदस्त डिजिटल वॉर देखने को मिला।
यह चुनाव एक बार फिर साबित करता है कि भारतीय मीडिया का एक बड़ा वर्ग निष्पक्षता से दूर हो चुका है और अब वह सत्ता के एक हथियार के रूप में काम कर रहा है। अगर यह सिलसिला यूँ ही जारी रहा, तो आने वाले चुनावों में जनता तक सही जानकारी पहुँचना और भी मुश्किल हो जाएगा।
8. जनता का क्या रहा रुख?
8.1 युवाओं का समर्थन किसे मिला?
दिल्ली चुनाव 2025 में युवाओं की भूमिका अहम रही। बेरोजगारी और शिक्षा जैसे मुद्दे युवाओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण थे। AAP ने अपनी रोजगार गारंटी योजना, स्टार्टअप फंड और शिक्षा सुधार मॉडल को आगे रखकर युवाओं को लुभाने की कोशिश की, जबकि बीजेपी ने ‘राष्ट्रवाद’ और ‘मोदी लहर’ पर ज्यादा जोर दिया। हालाँकि, सरकारी भर्तियों में देरी, महंगाई और बढ़ती अस्थिरता के कारण युवा मतदाता पूरी तरह किसी एक पार्टी के पक्ष में नहीं गए। कॉलेज स्टूडेंट्स और प्रोफेशनल्स ने AAP के शिक्षा मॉडल की सराहना की, जबकि कुछ युवा वोटर बीजेपी के हिंदुत्व नैरेटिव से प्रभावित दिखे।
8.2 महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार कितना प्रभावी मुद्दा रहा?
महंगाई और बेरोजगारी दिल्ली चुनाव 2025 में सबसे अधिक चर्चित मुद्दे रहे। आम आदमी पार्टी ने महंगाई के खिलाफ अपनी मुफ्त सुविधाओं को एक बचाव के रूप में प्रस्तुत किया, जबकि बीजेपी ने दावा किया कि ‘डबल इंजन सरकार’ से आर्थिक विकास होगा। लेकिन जमीनी हकीकत यह रही कि पेट्रोल-डीजल, सब्जियाँ, रसोई गैस और रोजमर्रा की जरूरतों की कीमतों में बढ़ोतरी से जनता परेशान थी। बेरोजगारी भी बड़ा मुद्दा रही, खासकर युवा मतदाताओं के बीच। बीजेपी भ्रष्टाचार को मुख्य मुद्दा बनाकर AAP सरकार को घेरती रही, लेकिन आम जनता के लिए भ्रष्टाचार से ज्यादा महंगाई और बेरोजगारी की मार अधिक महत्वपूर्ण थी।
8.3 क्या यह चुनाव दिल्ली के विकास के मुद्दों पर लड़ा गया?
दिल्ली चुनाव 2025 विकास के मुद्दों से अधिक राजनीतिक घमासान और ध्रुवीकरण पर केंद्रित रहा। AAP ने अपनी शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली और पानी की योजनाओं को आगे रखकर चुनाव लड़ा, जबकि बीजेपी ने ‘डबल इंजन सरकार’, ‘फ्री की रेवड़ी’ और ‘राष्ट्रवाद’ के नैरेटिव को बढ़ावा दिया। चुनाव प्रचार के दौरान दिल्ली की ट्रांसपोर्ट, पर्यावरण और शहरी विकास योजनाओं पर गंभीर चर्चा कम ही हुई। मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर चुनावी विमर्श AAP बनाम बीजेपी की जंग में तब्दील हो गया, जिससे विकास के वास्तविक मुद्दे पीछे छूट गए। जनता को जिन समस्याओं पर वोट करना था, वे मुद्दे प्रचार की शोरगुल में दबकर रह गए।
9. निष्कर्ष: लोकतंत्र की परीक्षा या साजिश का खेल?
दिल्ली चुनाव 2025 ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारतीय लोकतंत्र अब केवल जनता की इच्छाओं से नहीं, बल्कि राजनीतिक रणनीतियों, मीडिया के नैरेटिव और सरकारी एजेंसियों के दखल से संचालित हो रहा है।
क्या यह चुनाव निष्पक्ष था या लोकतंत्र की हार?
क्या यह विपक्ष की रणनीतिक हार थी या लोकतंत्र की साजिशन घेराबंदी?
इन सभी सवालों के जवाब आने वाले समय में स्पष्ट होंगे, लेकिन एक बात तय है – दिल्ली चुनाव 2025 सिर्फ़ एक चुनाव नहीं था, बल्कि लोकतंत्र की असली परीक्षा थी।