प्रस्तावना (Introduction)
क्या आप जानते हैं कि “23 मार्च 2025 शहीदी दिवस: सिर्फ़ यादें नहीं, जिम्मेदारी भी है!“ भारत की एक नई नवेली पार्टी जो भगत सिंह तथा बाबा साहब भीमराव अंबेडकर के उसूलों पर चलकर राजनीति करती है, वह देश के स्वतंत्रता सैनानियों के विचारों को देश के हर इंसान के दिल में जिंदा रखने में प्रयासरत रहती है। जी हां आप ठीक समझ रहे हैं वह पार्टी है आम आदमी पार्टी। AAP का ‘एक शाम शहीदों के नाम’ कार्यक्रम आगामी 23 मार्च 2025 को AAP के मुख्यालय, पंडित रविशंकर शुक्ला लेन, बंगला नंबर 1, मंडी हाउस न्यू दिल्ली में आयोजित होने जा रहा है। जो, AAP के देश और दुनियां के हर कोने में बसे लाखों कार्यकर्ताओं तथा समर्थकों की तरफ़ से भगत सिंह और उनके साथियों की स्मृति में श्रद्धांजलि होगी। यह कार्यक्रम दिल्ली, देश और दुनिया में फैले AAP कार्यकर्ताओं के साथ साथ सभी देशभक्तों को प्रेरित करने और उनके विचारों से जोड़ने का एक अनूठा प्रयास हो सकता है।
हर साल 23 मार्च को हम उन वीरों को याद करते हैं, जिन्होंने देश की आज़ादी के लिए हंसते हंसते अपने प्राण न्योछावर कर दिए। इस दिन को भारत में शहीदी दिवस के रूप में मनाया जाता है । उन वीर शहीदों में सामिल हैं भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु जिनकी याद में हम हर साल 23 मार्च को शहीदी दिवस के रूप में मनाते हैं। जिन्हें 1931 में ब्रिटिश सरकार ने फांसी दी थी।
23 मार्च भारत के इतिहास में एक महत्वपूर्ण दिन है, जो स्वतंत्रता सेनानियों भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की शहादत को याद करता है। यह दिन हमें उनके बलिदान और स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान की याद दिलाता है। इस लिए भारत की एक ऐसी नई नवेली पार्टी, आम आदमी पार्टी जो भगत सिंह तथा बाबा साहब भीमराव अंबेडकर के उसूलों पर राजनीति करती है ।
2025 में, आम आदमी पार्टी (AAP) इस दिन को विशेष रूप से ‘एक शाम शहीदों के नाम’ कार्यक्रम के माध्यम से मनाने की योजना बना रही है, जो भगत सिंह की शहादत की 94वीं वर्षगांठ को दुनियां और भारत के हर उस इंसान के दिल में जिंदा करना चाहती है जो अपने देश, अपनी मातृभूमि से ज़रा सा भी प्यार करता है। हम इस ब्लॉग के माध्यम से और अधिक गहनता से यह जानेंगे कि शहीदी दिवस का ऐतिहासिक महत्व और इसका भारत की आज़ादी में क्या योगदान रहा ? भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव के बलिदान की प्रासंगिकता आज भी क्यों बनी हुई है? क्या केवल उन्हें याद करना काफ़ी है, या हमें उनके सपनों को साकार करने के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए?
1. शहीदी दिवस का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य
1.1. 23 मार्च 1931: बलिदान की गाथा
ब्रिटिश सरकार द्वारा भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी देने की पृष्ठभूमि क्या रही होगी। तथा स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान और क्रांतिकारी विचारधारा का विश्लेषण इत्यादि को बहुत ही गहराई से समझने की आवश्यक्ता हैं। भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) के सदस्य थे । ये सभी क्रांतिकारी वीर ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकने के लिए सशस्त्र संघर्ष में शामिल थे। जो भारतीय इतिहास में महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं। जब 1928 में, लाला लाजपत राय पर साइमन कमीशन के विरोध के दौरान पुलिस ने लाठीचार्ज किया, जिससे उनकी मृत्यु हो गई। इस घटना से आक्रोशित होकर, भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु ने ब्रिटिश पुलिस अधिकारी जॉन सॉन्डर्स की हत्या की योजना बनाई, जिसे उन्होंने 17 दिसंबर 1928 को अंजाम दिया। उनका उद्देश्य लाला लाजपत राय की मृत्यु का प्रतिशोध लेना था। इसका परिणाम उक्त वीर क्रांतिकारियों को अपने आपको शहीद करके चुकाना पड़ा।
इस घटना के बाद, अंग्रेजी सरकार ने विशेष ट्रिब्यूनल का गठन किया, जिसने भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को मौत की सजा सुनाई। फांसी की तिथि 24 मार्च 1931 निर्धारित की गई थी, लेकिन बढ़ते जनाक्रोश और विरोध प्रदर्शनों के कारण, अंग्रेज़ी हुकूमत ने उन्हें 23 मार्च 1931 को शाम 7:33 बजे लाहौर सेंट्रल जेल में फांसी दे दी। फिरंगियों की हुकूमत ने यह निर्णय भारतीय जनता जो अपने वीर क्रांतिकारियों को बेहद मोहब्बत करती थी, के संभावित विद्रोह के भय से तय समय से पहले ही ले लिया गया था।
सार्वजनिक रुप से इन वीर क्रांतिकारियों को फांसी का जो दिन तथा समय तय किया गया था वह 24 मार्च 1931था। जैसा कि भगत सिंह को ज्ञात था। फांसी से पहले, भगत सिंह लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे। जब जेल के अधिकारियों ने उन्हें फांसी के लिए बुलाया, तो उन्होंने कहा, “ठहरिये! पहले एक क्रांतिकारी दूसरे क्रांतिकारी से मिल तो ले।” इसके बाद, उन्होंने किताब बंद की और बोले, “ठीक है, अब चलो।” बताया जाता है कि फांसी पर जाते समय, तीनों क्रांतिकारी अपने आप को बहुत ही गौरवान्वित महसूस कर रहे थे। और आगे बढ़ते बढ़ते यह गीत: “मेरा रंग दे बसंती चोला” गाते गाते जा रहे थे, जो उनके अदम्य साहस और देशभक्ति को दर्शा रहा था।
इन वीरों के बलिदान ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को नई ऊर्जा दी और युवाओं को प्रेरित किया। उनकी शहादत आज भी देशभक्ति और स्वतंत्रता के प्रति समर्पण का प्रतीक है, जिसे शहीदी दिवस के रूप में याद किया जाता है। आज का हर यूवा जब इन वीर क्रांतिकारियों को पढ़ता है या इनके बारे में सुनता है तो उसके रोंगटे खड़े हो जाते हैं और उसके अंतर्मन में देश भक्ति का एक अनूठा जज़्बा खुद ही पैदा होने लग जाता है।
1.2. उनकी विचारधारा: केवल स्वतंत्रता नहीं, समतामूलक समाज
भगत सिंह की विचारधारा केवल राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं थी, बल्कि वे एक समतामूलक समाज की परिकल्पना करते थे, जहाँ आर्थिक और सामाजिक न्याय हो। उन्होंने अपने लेखों और जेल नोट्स में सामाजिक समानता, शोषण-मुक्त समाज और वैज्ञानिक सोच पर ज़ोर दिया। उनकी प्रसिद्ध किताब “मैं नास्तिक क्यों हूँ” और अन्य लेखों में तर्कवाद और स्वतंत्र सोच की झलक मिलती है। भगत सिंह मार्क्सवादी विचारधारा से प्रभावित थे और मानते थे कि केवल ब्रिटिश शासन से मुक्ति पर्याप्त नहीं, बल्कि समाज के हर तबके को समान अधिकार और अवसर मिलना ज़रूरी है। उनका यह दृष्टिकोण आज भी प्रासंगिक है, खासकर सामाजिक असमानता और आर्थिक विषमता के दौर में।
2. क्या हमने उनके सपनों का भारत बनाया?
2.1. राजनीतिक परिदृश्य: क्या हम वास्तव में स्वतंत्र हैं?
अब हम स्वतंत्र भारत की राजनीतिक स्थिति और आज़ादी के मूल्यों का विश्लेषण करते हुए सोचते हैं कि क्या हमारे नेता और स्वतन्त्रता के बाद की सरकारें उनके आदर्शों पर खरे उतर रहे हैं? क्या हमने शहीदों के बलिदान का पूरा सम्मान किया है? वास्तविकता तो यह रही है कि भारत की आज़ादी के सूत्रधारों ने जो सपने भारत के भविष्य को लेकर संजोए होंगे उन तमाम सपनों को साकार करने के लिए पूरी कोशिशें हमारे नेताओं ने तथा सरकारों ने अवश्य ही की ही होंगी। लेकिन जितनी और जिस नियत से कोशिशें की गई हैं वो अपेक्षित तो नहीं लगतीं। हमारे कहने का मतलब यह तो कतहीं नहीं है कि भगत सिंह तथा बाबा साहब भीमराव अंबेडकर के सपनों के भारत के लिए प्रयास नहीं किए गए हों।
तमाम प्रगति के बावजूद, कुछ सवाल उठते हैं कि आर्थिक विकास के बावजूद, समाज में आर्थिक और सामाजिक असमानताएँ बनी हुई हैं। क्या हम सभी नागरिकों को समान अवसर प्रदान कर पाए हैं? तो इसका सही उत्तर तो मेरी और आपकी नज़र में यही बनता है कि जितना होना चाहिए उतना नहीं हो पाया है। आज राजनीतिक और प्रशासनिक क्षेत्रों में भ्रष्टाचार अभी भी एक बड़ी समस्या है। क्या यह उन मूल्यों के अनुरूप है, जिनके लिए शहीदों ने बलिदान दिया था? इन तमाम प्रश्नों जो हमारे अंतःकरण में उठकर हमें कचोटते हैं, के माध्यम से हमें आत्ममंथन करना चाहिए कि क्या हमने शहीदों के सपनों का भारत बनाया है, या अभी भी हमें उनके आदर्शों को साकार करने के लिए प्रयासरत रहना है।
2.2. सामाजिक असमानता और न्याय
हमारे आज के भारत, जिसमें हम रहते हैं इस आधुनिक भारत के लिए हमारे स्वतन्त्रता सेनानियों ने जिस भारत की तस्वीर अपने मन में बनाई होगी वो तस्वीर तो नज़र नहीं आती। आज़ादी के 75 साल बाद भी तस्वीर धुंधली ही नज़र आती है। जातिवाद, सांप्रदायिकता और सामाजिक भेदभाव की आज भी मौजूदगी। क्या सभी को समान अवसर और न्याय मिल रहा है? क्या हम एक न्यायसंगत समाज का निर्माण कर पाए हैं? लेकिन ऐसा तो कतहीं नहीं कहा जा सकता है कि हमारे नेता और सरकारों ने कोशिश नहीं की हां यह तो सच है कि कोशिश जितनी सिद्दत से की जानी चाहिए उतनी नहीं की गई।
2.3. आर्थिक विकास बनाम विषमता
भारत की GDP और गरीबी दर को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि क्या वाकई गरीबों की स्थिति सुधर रही है? या फिर यह कहा जाए कि हम बड़े कॉरपोरेट्स और आम जन तथा मजदूरों की समानता की दिशा में बढ़ रहे हैं? भारत की आर्थिक विकास दर पिछले कुछ दशकों में तेजी से बढ़ी है, लेकिन क्या यह विकास समान रूप से सभी तक पहुंचा है? 2023-24 में भारत की GDP वृद्धि दर 7.6% रही, लेकिन दूसरी ओर, मल्टीडायमेंशनल पॉवर्टी इंडेक्स (MPI) 2023 के अनुसार, भारत में अब भी 14.96% लोग गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहे हैं। बड़े कॉरपोरेट्स का मुनाफा लगातार बढ़ रहा है, लेकिन असंगठित क्षेत्र के मजदूर अब भी न्यूनतम वेतन और सामाजिक सुरक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं। श्रम संगठनों के अनुसार, भारत में 90% से अधिक मजदूर असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं, जहां उनके अधिकारों की रक्षा कमजोर है। ऐसे में, आर्थिक विकास की रफ़्तार तेज़ होने के बावजूद, सामाजिक और आर्थिक समानता का सपना अभी भी अधूरा है।
3. हमारी ज़िम्मेदारी: सिर्फ़ श्रद्धांजलि नहीं, सक्रिय भागीदारी
3.1. सरकार की भूमिका
वास्तव में हमारी जिम्मेदारी सिर्फ़ श्रद्धांजलि अर्पित करना ही नहीं बल्कि भ्रष्टाचार और सामाजिक असमानता को दूर करने के लिए ठोस नीतियों का निर्माण कर उन्हें लागू करना भी बनती है। और शिक्षा प्रणाली में भगत सिंह की विचारधारा को प्रमुखता देना हमारी सरकारों की जिम्मेदारी भी होनी चाहिए। लेकिन भ्रष्टाचार और सामाजिक असमानता को दूर करने के लिए सरकार को अपनी पूरी नियत से ठोस नीतियाँ बना कर उन्हें धरातल पर मूर्त रूप देने में पूरी शक्ति लगानी ही पड़ेगी। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की रिपोर्ट के अनुसार, भारत 180 देशों में 85वें स्थान पर है, जो दर्शाता है कि पारदर्शिता और जवाबदेही की अभी भी कमी है। सरकार को भ्रष्टाचार-रोधी कानूनों को सख्ती से लागू करना होगा और सभी वर्गों के लिए समान अवसर सुनिश्चित करने होंगे। इसके अलावा, शिक्षा प्रणाली में भगत सिंह की विचारधारा को प्रमुखता देकर, युवाओं को न केवल स्वतंत्रता संग्राम का सही दृष्टिकोण सिखाया जा सकता है, बल्कि उनमें सामाजिक बदलाव लाने की प्रेरणा भी दी जा सकती है।
3.2. समाज और युवाओं की ज़िम्मेदारी
आज दुनियां में डिजिटल क्रांति आई हुई है। इसके साथ ही भारत सरकार ने भी डिजिटल क्रांति में बजट में इसके लिए अलग से प्रावधान किया है। तो हमारी और आपकी भी कुछ तो जिम्मेदारी बनती है कि हम डिजिटल मीडिया के माध्यम से उनकी विचारधारा का प्रचार-प्रसार करने की कोशिश करें और सामाजिक और राजनीतिक सक्रियता को बढ़ावा दें। देश को क्रांतिकारियों के सपनों के अनुरूप बनाने में समाज और विशेष रूप से युवाओं की अहम भूमिका है। भगत सिंह के विचारों को केवल किताबों तक सीमित रखने के बजाय, डिजिटल मीडिया के माध्यम से उन्हें जन-जन तक पहुँचाना होगा। सोशल मीडिया प्लेटफार्मों, ब्लॉग्स, और यूट्यूब के जरिए जागरूकता बढ़ाई जा सकती है। इसके साथ ही, केवल विचार साझा करना ही नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक सक्रियता को बढ़ावा देना भी ज़रूरी है। युवाओं को सामाजिक अन्याय और सरकारी नीतियों पर सवाल उठाने चाहिए और जनहित के मुद्दों पर सक्रिय भागीदारी करनी चाहिए।
3.3. डिजिटल क्रांति और युवा नेतृत्व
यदि हम अगर भगत सिंह के विचारों से प्रभावित हैं तो हमें डिजिटल अभियानों, ऑनलाइन जागरूकता और सोशल मीडिया का उपयोग करना ही चाहिए। और हमें यह भी देखना होगा कि क्या हम डिजिटल मीडिया के ज़रिए सही मायनों में उनके विचारों को आगे बढ़ा रहे हैं? डिजिटल युग में बदलाव की बागडोर अब युवाओं के हाथ में है। ऑनलाइन अभियानों, सोशल मीडिया जागरूकता और डिजिटल माध्यमों के जरिए भगत सिंह की विचारधारा को नए सिरे से प्रस्तुत किया जा सकता है। हाल ही में कई युवा आंदोलन सोशल मीडिया के माध्यम से ताकतवर बने हैं, जैसे #MeToo और #FarmersProtest, जिससे यह साबित होता है कि डिजिटल क्रांति बदलाव लाने में सक्षम है। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या हम सही मायनों में डिजिटल मीडिया का उपयोग कर उनके विचारों को आगे बढ़ा रहे हैं, या केवल औपचारिकता निभा रहे हैं? इसके लिए हमें प्रभावी डिजिटल कंटेंट, अभियान और संवाद स्थापित करने होंगे, जिससे उनकी विचारधारा केवल शब्दों में नहीं, बल्कि समाज में बदलाव के रूप में दिखाई दे।
4. AAP का कार्यक्रम और इसकी प्रासंगिकता
आम आदमी पार्टी ने पिछले दस सालों के शासन काल में देश की शिक्षा में दिल्ली से क्रांति शुरू की जो आज पंजाब में भी लागू कर दी गई है। AAP ने कहीं न कहीं उक्त क्रांतिकारियों के सपनों से प्रेरित होकर शिक्षा के क्षेत्र में दिल्ली में वो बदलाब किए जो बाबा साहब भीमराव अंबेडकर जी तथा भगत सिंह ने भारत के लिए की जनता के लिए सोचे होंगे। अगर आप “AAP की दिल्ली की शिक्षा क्रान्ति को गहनता से समझना चाहते हैं तो यहां पर क्लिक करें।”
शिक्षा क्रान्ति के साथ साथ आपने देश में दिल्ली का तीन स्तरीय स्वास्थ्य मॉडल बनाया जिसने देश दुनिया में तहलका मचा के रख दिया था। आम आदमी पार्टी के मोहल्ला क्लिनिक मॉडल को देश के कई राज्यों ने ही नहीं वल्कि अमेरिका ने भी अपने यहां अपनाने की मनसा जाहिर की थी। AAP के स्वास्थ्य मॉडल को गहराई से समझने के लिए यहां पर क्लिक कर सकते हैं।
आज देश में आम आदमी पार्टी लोकतन्त्र का असली मतलब समझा रही है। AAP की दिल्ली में दस साल सरकार रही और पिछले तीन सालों से पंजाब में सरकार भगत सिंह तथा बाबा साहब भीमराव अंबेडकर जी के सपनों को हकीकत में अपना कर देश में हर इंसान के दिल में देश भक्ति की आग पैदा करना चाहती है। और देश को नंबर 1 बनाने के पथ पर प्रयासरत है।
इस आग को देश के AAP क्रायकर्ताओं, समर्थकों के साथ साथ हर देशवासी के दिल में धधकाने के वास्ते 2025 में, AAP ने घोषणा की है कि वह 23 मार्च को ‘एक शाम शहीदों के नाम’ कार्यक्रम आयोजित करेगी, जो दिल्ली मुख्यालय में होगा। यह कार्यक्रम भगत सिंह की शहादत को याद करने और पार्टी की सभी राज्यों की इकाई के कार्यकर्ताओं को प्रेरित करने के लिए भी कही जा सकती है। साथ ही यह पहल AAP की संगठनात्मक पुनर्गठन की शुरुआत को भी चिह्नित करने की कसौटी भी कही जा सकती है। कार्यक्रम का उद्देश्य यह सार्थक करने का हो सकता है कि जो लोग भगत सिंह और उनके साथियों के विचारों का सम्मान करते हैं वो AAP से जुडें, जिससे एकता और देश भक्ति की भावना पैदा होगी। और देखना यह होगा कि भगत सिंह तथा बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर से प्रेरणा लेकर AAP भारत को नंबर 1 की स्थिति में लाने के लिए कितने उग्र रूप से प्रयासरत रहेगी।
तालिका: शहीदी दिवस और संबंधित तथ्य
तिथि | घटना | महत्व |
23 मार्च 1931 | भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी | स्वतंत्रता संग्राम में उनके बलिदान की याद |
23 मार्च 2025 | AAP का ‘एक शाम शहीदों के नाम’ कार्यक्रम | भगत सिंह की स्मृति में श्रद्धांजलि और प्रेरणा |
5. निष्कर्ष: शहीदी दिवस सिर्फ़ एक दिन नहीं, एक संकल्प है!
23 मार्च शहीदी दिवस हमें भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के बलिदान को याद करने का अवसर देता है। अगर हम वास्तव में शहीदों का सम्मान करना चाहते हैं, तो हमें उनकी विचारधारा को अपने जीवन में उतारना होगा। यह सिर्फ़ फूल चढ़ाने का दिन नहीं, बल्कि आत्मविश्लेषण का भी अवसर है। हमें यह तय करना होगा कि हम कैसा भारत बनाना चाहते हैं – वही, जिसका सपना भगत सिंह और उनके साथियों ने देखा था, या फिर ऐसा देश जो उनकी कुर्बानियों को भूलता जा रहा है? AAP का 2025 में आयोजित होने वाला कार्यक्रम इस दिन को और अधिक प्रासंगिक बनाता है, जो हमें उनके आदर्शों को जीवित रखने और एक न्यायपूर्ण समाज के लिए काम करने की प्रेरणा देता है।
- इस शहीदी दिवस पर सिर्फ़ मौन न रखें, बल्कि उनके विचारों को दूसरों तक पहुँचाएं।
- सोशल मीडिया पर उनकी क्रांतिकारी सोच को सही संदर्भ में साझा करें।
- अपने आसपास के लोगों को सामाजिक अन्याय के ख़िलाफ़ जागरूक करें।
“शहीद हुए थे वो, ताकि हम जागें। सवाल यह है कि क्या हम वाकई जागे?”